बाढ़ से प्रभावित प्राचीन सांचीपात पांडुलिपियों के संरक्षण में जुटा गौहाटी विश्वविद्यालय
गुवाहाटी, 4 अगस्त: असम में आई भीषण बाढ़ के बीच गौहाटी विश्वविद्यालय ने राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की है। विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों की टीम शिवसागर जिले स्थित ऐतिहासिक मेधीजान श्री श्री गजाला सत्र में बाढ़ से क्षतिग्रस्त हुई दुर्लभ सांचीपात पांडुलिपियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन का कार्य कर रही है।
विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर साउथ ईस्ट एशियन स्टडीज़ के मेदिनी मोहन गोगोई तथा कृष्णकांत हांडीकुई पुस्तकालय के पांडुलिपि अनुभाग के धनजीत तालुकदार के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम पांडुलिपियों को सुरक्षित करने में जुटी है। संरक्षण प्रक्रिया के तहत पन्नों को सावधानीपूर्वक अलग किया जा रहा है, उनकी सफाई की जा रही है तथा रासायनिक उपचार के माध्यम से लंबे समय तक पानी में रहने के कारण उत्पन्न फफूंद और अन्य क्षति को रोकने का प्रयास किया जा रहा है।
संरक्षणाधीन पांडुलिपियों में कीर्तन, भक्ति रत्नावली, भक्ति प्रेमावली, विभिन्न चरित-पुथियां, कथासार सहित असम की आध्यात्मिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक परंपरा से जुड़े अनेक दुर्लभ ग्रंथ शामिल हैं। इनमें लगभग 300 वर्ष पुरानी रामायण, 263 वर्ष पुरानी कीर्तन पांडुलिपि तथा दशम जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पांडुलिपियां भी शामिल हैं।
गौहाटी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. ननी गोपाल महंत के नेतृत्व में विश्वविद्यालय पिछले कई वर्षों से असम की प्राचीन पांडुलिपियों, सांचीपात संग्रहों और पारंपरिक ज्ञान-संपदा के संरक्षण, शोध और पुनर्स्थापन के लिए निरंतर कार्य कर रहा है। यह पहल राज्य की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने की विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
इस अवसर पर कुलपति प्रोफेसर ननी गोपाल महंत ने कहा कि पांडुलिपियां असम की ज्ञान परंपरा, सभ्यता, संस्कृति और पहचान की जीवंत धरोहर हैं। उनका संरक्षण हमारी नैतिक, शैक्षणिक और सामाजिक जिम्मेदारी है।
उन्होंने कहा कि विरासत का संरक्षण केवल इतिहास को संजोने का प्रयास नहीं, बल्कि समाज की संस्कृति, मूल्यों और सामूहिक स्मृतियों को भविष्य की पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुंचाने का दायित्व भी है। 18वीं शताब्दी में स्थापित मेधीजान श्री श्री गजाला सत्र में संरक्षित पांडुलिपियां असम के इतिहास, साहित्य, दर्शन और आध्यात्मिक परंपरा की अमूल्य निधि हैं। इन दुर्लभ ग्रंथों का संरक्षण कर गौहाटी विश्वविद्यालय राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने और अतीत तथा भविष्य के बीच एक सशक्त सेतु निर्मित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है।

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