गौमाता को ‘राष्ट्रमाता’ घोषित करने की मांग: देशव्यापी हस्ताक्षर अभियान की शुरुआत
गुवाहाटी, 19 जुलाई: वृंदावन से पधारे स्वामी गोपाल नंदजी महाराज ने शनिवार शाम को नगर के पांडु स्थित सनातन देवालय में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने बताया कि असम सहित पूरे देश के गौ-प्रेमियों, साधकों, संतों और गौ-सेवकों के सहयोग से गौमाता की सुरक्षा के लिए एक अखिल भारतीय जन आंदोलन शुरू किया गया है।
इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन के तहत केंद्र सरकार के समक्ष ये मांगे रखी गयी कि देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में गौ-हत्या को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए। गौमाता को आधिकारिक रूप से ‘राष्ट्रमाता’ और राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए, गौ-सेवकों की सुरक्षा के लिए एक केंद्रीय कानून बनाया जाए। इसके साथ ही गौ-हत्या के दोषियों के लिए न्यूनतम आजीवन कारावास और संपत्ति जब्त करने जैसे सख्त कानूनी प्रावधान हों, बांग्लादेश सीमा से होने वाली गायों की तस्करी को पूरी तरह से रोका जाए ।
स्वामी गोपाल नंदजी महाराज ने कहा कि आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी देश में गौ-हत्या का सिलसिला जारी है। इसे रोकने के लिए पहले चरण में 40 करोड़ हस्ताक्षर जुटाने का लक्ष्य रखा गया है।27 अप्रैल को आंदोलन का पहला ज्ञापन सरकार को सौंपा गया। अब तक 12 करोड़ से अधिक हस्ताक्षर एकत्र किए जा चुके हैं।27 जुलाई को दूसरे चरण के तहत 15 करोड़ हस्ताक्षरों के साथ अगला ज्ञापन सरकार को सौंपा जाएगा। यह ज्ञापन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों और असम के मुख्यमंत्री सहित विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों को भेजा जाएगा।
इस आंदोलन की अनूठी विशेषता यह है कि इसमें किसी भी व्यक्ति को नेतृत्व का पद नहीं दिया गया है। गौमाता को ही सर्वोच्च मानकर समाज के सभी धर्मों और समुदायों के लोग एक समान सेवक के रूप में इसमें भाग ले रहे हैं।
संवाददाता सम्मेलन में असम के संदर्भ में भी कई महत्वपूर्ण मांगें उठाई गईं हैं। जैसे राज्य के लिए एक समान गौ-नीति लागू की जाए और 'गोचर बोर्ड' का गठन हो।पशुपालक किसानों को आर्थिक सहायता और उत्पादों का उचित मूल्य मिले।मृत गायों के अंतिम संस्कार के लिए स्थायी व्यवस्था की जाए।
गौ-सेवकों का मानना है कि गाय आधारित कृषि व्यवस्था अपनाने से असम के चाय बागानों के उत्पादन में वृद्धि होगी, फसलों में लगने वाले फंगस का नुकसान कम होगा और फल-सब्जियों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जा सकेगा। इसके अलावा, राज्य में 'गौशाला आधारित पर्यटन' की भी अपार संभावनाएं हैं।
इस अभियान को असम के प्रत्येक जिले से होते हुए कोहिमा से कश्मीर और कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैलाने की योजना है। 'कुर्बानी' और 'बलि' के संदर्भ में संतों ने स्पष्ट किया कि 'बलि' का वास्तविक अर्थ 'त्याग' है; इसलिए किसी जीव के प्राण लेने के बजाय प्रेम और त्याग के मूल्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
आंदोलनकारियों ने स्पष्ट किया है कि यदि 27 फरवरी 2027 तक उनकी मांगें पूरी नहीं की गईं, तो दिल्ली में एक दीर्घकालिक शांतिपूर्ण धरना (सत्याग्रह) शुरू किया जाएगा और आगे के एक बड़े आंदोलन की रूपरेखा घोषित की जाएगी।


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