महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की 458वीं पुण्यतिथि पर राज्यभर के सत्र और नामघरों में गूंजा हरिना्म कीर्तन
गुवाहाटी:12 सितंबर
महान समाज सुधारक, संस्कृति पुरुष और असमिया जाति के प्राण-प्रतिष्ठाता महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव की 458वीं पुण्यतिथि हनिवार पूरे राज्य में हर्ष उल्लास के साथ मनाया गया।
इस पवित्र अवसर पर पूरा असम भक्तिमय और आध्यात्मिक माहौल में डूबा हुआ है। सुबह से ही राज्य के विभिन्न सत्रों और नामघरों में भक्त-वैष्णव एकत्र होकर हरिना्म कीर्तन, बोरगीत और नाम प्रसंग के माध्यम से जगतगुरु को याद किया है।
असमिया संस्कृति और समाज के मुख्य शिल्पकार
श्रीमंत शंकरदेव केवल कला, साहित्य और संस्कृति के मार्गदर्शक ही नहीं, बल्कि असमिया आध्यात्मिक और सामाजिक जीवन के मुख्य निर्माता थे। उन्होंने नव-वैष्णव धर्म के प्रचार के माध्यम से समाज में आध्यात्मिक-सांस्कृतिक मूल्यों का विकास किया और लोगों को एकता के सूत्र में पिरोया। भक्ति आंदोलन की शुरुआत कर अंधविश्वास और कुप्रथाओं के खिलाफ जन-जागरूकता पैदा करने में उनका योगदान अमूल्य और अविस्मरणीय है।
इस अवसर पर प्रमुख धार्मिक स्थलों पर उमड़ी भक्तों की भारी भीड़
सुबह से ही बटद्रवा धाम (जन्म स्थान) में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है।
इसके अलावा कीर्तनघर, उत्तर-दक्षिण पदशिला, आकाशगंगा तट, ऐतिहासिक दौल मंदिर और सती राधिका मंदिर में हजारों भक्तों ने दीप जलाकर, शराई और नैवेद्य अर्पित कर गुरुजी के चरणों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। हरिना्म-कीर्तन की गूंज से पूरा क्षेत्र पवित्र हो उठा है।
अन्य प्रमुख स्थल।जैसे बरपेटा सत्र, गोलाघाट का आठखेलिया नामघर, ढेकीयाखोवा नामघर और माजुली के विभिन्न सत्रों-नामघरों में भी इस पावन तिथि पर विशेष धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जहां सुबह से ही एक गहरा आध्यात्मिक माहौल बना हुआ है।
राज्य के हर कोने में भक्तजन हरिना्म कीर्तन और गुरु वंदना के जरिए महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के महान आदर्शों और शिक्षाओं को याद किया हैं।

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