वन्दे मातरम् : राष्ट्रीय चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण
सुनीता हलदेकर
(अखिल भारतीय सह-कार्यवाहिका)
“वन्दे मातरम्”—ये दो शब्द केवल एक नारा नहीं हैं; यह भारत की आत्मा की जयध्वनि है। यह गीत भारतीय राष्ट्रीयता की आध्यात्मिक जड़ है, जिसमें भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान—इन चारों का मातृभाव में एकीकरण होता है।
१५० वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर २०२६ में भारत सरकार की नई दिशानिर्देशों तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय आह्वान ने इस गीत को पुनः राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित किया है।
भारतीय सभ्यता का मूल दर्शन : ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’
भारत में भूमि केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है; वह जीवन, संस्कार और मातृभाव की प्रतीक है। अथर्ववेद का यह वचन—
“माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः”—
वन्दे मातरम् गीत का वैदिक आधार है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक उद्घोष नहीं रचा, बल्कि प्राचीन भारतीय आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित किया। इसी कारण इस गीत में भारतमाता को लक्ष्मी (समृद्धि), सरस्वती (ज्ञान) और दुर्गा (शक्ति)—इन तीनों रूपों के समन्वय के रूप में चित्रित किया गया है।
बंकिमचन्द्र का राष्ट्रीय जागरण और गीत की रचना १८७५ में, जब भारत ब्रिटिश दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव के संकट से गुजर रहा था, तब बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की।
१८९६ के कांग्रेस अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इसे स्वरबद्ध किया, और यह गीत एक साथ—
स्वाभिमान का मंत्र, आध्यात्मिक संकल्प, और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया।
वन्दे मातरम् केवल एक काव्य नहीं था; यह भारतीय जनमानस का वेदमंत्र था—भारत को ब्रिटिश दासता से मुक्त कराने का शस्त्र भी और शास्त्र भी।
इस गीत की पंक्तियों में भारत के जल, फल, वायु, प्रकृति, शक्ति और ज्ञान—इन सबका अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण-मंत्र १९०५ के बंग-भंग आंदोलन में “वन्दे मातरम्” स्वतंत्रता संग्राम की युद्ध-घोषणा बन गया। छात्रों के जुलूसों में, महिलाओं की सभाओं में, क्रांतिकारियों की शपथों में, और समस्त राष्ट्रीय आंदोलनों में—
यह गीत गूंजता रहा। श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र-आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्यम भारती, लाला हरदयाल, भिकाजी कामा—सभी ने अपने समाचारपत्रों और पत्रिकाओं के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” का प्रयोग किया। महात्मा गांधी के अनेक पत्र इसी मंत्र से समाप्त होते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगाया, लोगों को गिरफ्तार किया—किन्तु यह गीत और अधिक शक्तिशाली बन गया। इसने जनता के हृदय में स्थायी स्थान बना लिया।
संघ का राष्ट्रीय आह्वान ३०–३१ अक्टूबर तथा १ नवम्बर २०२५ को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक में माननीय सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले जी ने कहा—
“वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्रीय चेतना को जाग्रत करता है।”
“विभाजनकारी प्रवृत्तियों के इस युग में यह समाज को जोड़ने वाला अद्भुत सूत्र है।”
“यह सभी प्रदेशों, भाषाओं और समाजों द्वारा समान रूप से स्वीकार किया गया गीत है।”
“यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और स्वबोध का आधार है।”
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस १५० वर्षीय पवित्र कालखंड में वन्दे मातरम् की ज्योति प्रत्येक हृदय में प्रज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र-निर्माण का संकल्प लिया जाए।
२०२६ की नई दिशा : सम्पूर्ण गीत को राष्ट्रीय सम्मान १० फरवरी २०२६ को भारत सरकार ने घोषणा की—
अब वन्दे मातरम् के सभी ६ अंतरे (लगभग ३ मिनट १० सेकंड) राष्ट्रीय गीत से पूर्व राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाए जाएंगे।
राष्ट्रपति के आगमन-प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज कार्यक्रम, पद्म पुरस्कार समारोह तथा सभी सरकारी आयोजनों में इसका गायन होगा। विद्यालयों में दैनिक प्रार्थना वन्दे मातरम् से प्रारंभ होगी।
इसमें कोई कानूनी दंड नहीं है—क्योंकि यह कोई दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनःस्थापना है।
केवल दो शब्द नहीं—सम्पूर्ण गीत ही राष्ट्रीय चेतना है आज “वन्दे मातरम्” प्रायः केवल दो शब्दों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि इसकी वास्तविक महत्ता सम्पूर्ण गीत में निहित है। दो शब्द भावना जगाते हैं, सम्पूर्ण गीत चेतना जाग्रत करता है।
पूरी रचना हमें राष्ट्रीयता, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले जाती है—जहाँ प्रकृति, संस्कृति, ज्ञान और शक्ति एक साथ विद्यमान हैं।
वन्दे मातरम्—भारत की आत्मा का स्वर १५० वर्षों बाद भी “वन्दे मातरम्” केवल स्मृति नहीं है; यह भारत के भविष्य का पथप्रदर्शक है।
यह हमें सिखाता है—
राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता है।
राष्ट्र-सेवा केवल कर्तव्य नहीं, तपस्या और साधना है।
मातृभूमि केवल भूमि नहीं, चेतना, पहचान और अस्तित्व है।
आज इस गीत के सम्पूर्ण रूप को जो सम्मान मिला है, वह केवल इतिहास का सम्मान नहीं—यह भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का संकेत है।
अनगिनत ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारी वीरों और वीरांगनाओं ने भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया। उनके लिए, और उनकी प्रेरणास्रोत माताओं, पत्नियों, बहनों और पुत्रियों के लिए यह गौरव और सम्मान का विषय है।
बालक केशव हेडगेवार द्वारा नील सिटी हाईस्कूल में ब्रिटिश शिक्षाधिकारी का “वन्दे मातरम्” जयघोष से स्वागत करने की घटना—संघ के शताब्दी वर्ष में डॉक्टर हेडगेवार के लिए अमूल्य सम्मान है।
राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका वंदनीय मौसीजी का स्वप्न था कि वन्दे मातरम् राष्ट्रगीत बने—इसी कारण समिति के प्रत्येक कार्यक्रम का समापन वन्दे मातरम् से होता है। आज वंदनीय मौसीजी का यह स्वप्न साकार हुआ है।
वन्दे मातरम् का गायन—भारत के मूल चित्त की चिरंतन लयबद्ध संगीत, शस्त्र, शास्त्र और दिव्य मंत्र बने।
और भारतमाता विश्व के दरबार में पुनः प्रतिष्ठित हों—यह हमारा संकल्प है।

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